INS Mangrol: भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने की दिशा में एक और कदम उठाया गया है। स्वदेशी युद्धपोत INS Mangrol (P82) को मुंबई स्थित नौसेना डॉकयार्ड में आधिकारिक तौर पर नौसेना में शामिल कर लिया गया है। माहे श्रेणी का यह तीसरा पनडुब्बी रोधी युद्धपोत है, जिसे खास तौर पर तटीय इलाकों और कम गहरे समुद्र में काम करने के लिए तैयार किया गया है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे बनाने में 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है।
इस कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्स्यायन ने की। इस युद्धपोत का डिजाइन और निर्माण कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) ने किया है। इसके निर्माण में भारतीय रक्षा उद्योगों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) ने भी योगदान दिया है।
INS Mangrol की 5 खास बातें
1. कम गहरे समुद्र में करेगा काम
INS Mangrol एक एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) है। इसे तटीय क्षेत्रों और कम गहरे पानी में पनडुब्बियों से पैदा होने वाले खतरों का पता लगाने और उनसे निपटने के लिए बनाया गया है।
2. 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री
इस युद्धपोत में 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। यह भारत में रक्षा उपकरणों के निर्माण और मेक इन इंडिया पहल को मजबूती देने की दिशा में अहम कदम है।
3. कोचीन शिपयार्ड में हुआ निर्माण
INS Mangrol को कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने तैयार किया है। इसके निर्माण में देश के रक्षा उद्योगों और MSME क्षेत्र की भागीदारी भी रही है, जिससे स्वदेशी निर्माण क्षमता को बढ़ावा मिलता है।
4. पनडुब्बियों के खतरों पर रखेगा नजर
इस युद्धपोत में आधुनिक सेंसर, सोनार और हथियार प्रणालियां लगी हैं। इनकी मदद से यह पानी के भीतर मौजूद खतरों का पता लगाने और उनकी निगरानी करने में सक्षम है। इसके अलावा, यह समुद्री निगरानी और कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
5. गुजरात के तटीय शहर के नाम पर रखा गया नाम
INS Mangrol का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय शहर मंगरोल के नाम पर रखा गया है। यह शहर मछली पकड़ने के प्रमुख बंदरगाह के रूप में जाना जाता है। नया युद्धपोत पुराने INS Mangrol (M85) की विरासत को भी आगे बढ़ाता है, जो अप्रैल 2004 तक भारतीय नौसेना में सेवा दे रहा था।








