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ज्वलंत मुद्दाः दो खेमों मे बंटी मीडिया के हालात..

भारत में कई ऐसे मीडिया संस्थान हैं जो खुद को लिबरल तो कहते हैं लेकिन पक्षपात करने से बाज नहीं आते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि भारत का मीडिया इन दिनों चाहे जो भी कर रहा हो मगर पत्रकारिता नहीं कर रहा है। यहां मीडिया दो खेमों में बंट गया है। पढ़ें युवा डाइनामाइट विशेष.. नई दिल्लीः भारत का मीडिया इन दिनों चाहे जो भी कर रहा हो मगर पत्रकारिता नहीं कर रहा है। सच की आवाज बुलंद करने वालों को दबाया जा रहा है। मीडिया सूचना स्त्रोत के रुप में खबरें पहुंचाने का काम करता है, तो वहीं हमारा मनोरंजन भी करता है। मीडिया जहां संचार का साधन है, तो वहीं परिवर्तन का वाहक भी है। लेकिन, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में निरंतर हो रही पत्रकारों की हत्या, मीडिया चैनलों के प्रसारण पर लगायी जा रही बंदिशें और कलमकारों के मुंह पर आए दिन स्याही पोतने जैसी घटनाओं ने प्रेस की आजादी को संकट के घेरे में ला दिया है। आज ऐसा कोई सच्चा पत्रकार नहीं होगा, जिसे रोज-ब-रोज मारने व डराने की धमकी नहीं मिलती होगी। हालांकि, भारत में मीडिया पर भ्रष्टाचार का आरोप बेहद पुराना है। समाचारपत्रों और टी.वी. चैनलों पर किसी विशिष्ट व्यक्ति, कॉरपोरेट इकाई, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों आदि के पक्ष में धन लेकर सूचनाएँ प्रकाशित या प्रसारित करने के आरोप लगते रहे हैं।

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